हमराही

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Sunday, June 16, 2013

'पिता' पर स्वरचित रचनाएँ : भाग 2.

आज 'पिता दिवस' है |
सभी पिताओं से अनुरोध 
कि 
बच्चों के सही मार्गदर्शक बनकर 
उन्हें सही गलत के चयन में उनका साथ दें |
एवं 
सभी बच्चे अपने पिता के सही चुनाव 
को आज्ञापूर्वक स्वीकार करें |
' सभी को पितादिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ' 


 
मेरे पिता

माँ ने जो बेशुमार प्यार दिया,
पिता ने चुपचाप दुलार किया !
ऊँगली पकड़ जो चलना सिखाया,
तुतलाते बोलों ने अर्थ आपसे पाया !
पिता की डांट में छुपा था प्यार ,
जिसका न हो पाया कभी इजहार !
अन्दर से नरम और ऊपर से कठोर ,
अकेले बैठ हमेशा ही हुए भावविभोर !
बेटे बेटी का न कभी किया अंतर ,
चलते ही रहे बिना थके आप निरंतर !
माँ के माथे की बिंदिया का थे विश्वास ,
साथ हमेशा होने का दिलाया अहसास !
जब था अनजान सब दुनिया का नजारा ,
पिता के कन्धों पर बैठ देखा जग सारा !
जिंदगी के सफ़र का जब आपने विश्राम पाया ,
हमने कन्धों पर आपको मोक्षद्वार पहुँचाया !
पिता की छांव ने सिखाया खिलखिलाना ,
'सरिता' निरंतर बहना न व्यर्थ आँसू बहाना !! 

सरिता भाटिया

 
माँ धरा तो आकाश है पिता
व्योम-धरा पर संसार है पिता ।
नभ से भी ऊँचा प्यार है तेरा
सागर सा गंभीर मुस्कान है तेरा ।
माँ ने दिया यहाँ जनम हमें
तुमने सिखलाई जीने की कला ।
जीवन ऊर्जा हम तुमसे पाते
हर मुश्किल में मार्ग दिखाते ।
दुःख की साया पड़े न हम पर
नीलकंठ बन तुम दुःख पी जाते ।
जीवन की इस आपाधापी में
अडिग रहते तुम हिमालय सा ।

रंजना वर्मा

ग़ज़ल : शीर्षक पिता
बह्र :हजज मुसम्मन सालिम

घिरा जब भी अँधेरों में सही रस्ता दिखाते हैं ।
बढ़ा कर हाँथ वो अपना मुसीबत से बचाते हैं ।।
बड़ों को मान नारी को सदा सम्मान ही देना ।
पिता जी प्रेम से शिक्षा भरी बातें सिखाते हैं ।।
दिखावा झूठ धोखा जुर्म से दूरी सदा रखना ।
बुराई की हकीकत से मुझे अवगत कराते हैं ।।
सफ़र काटों भरा हो पर नहीं थकना नहीं रुकना ।
बिछेंगे फूल क़दमों में अगर चलते ही जाते हैं ।।
ख़ुशी के वास्ते मेरी दुआ हरपल करें रब से ।
जरा सी मांग पर सर्वस्व वो अपना लुटाते हैं ।।
मुसीबत में फँसा हो गर कोई बढ़कर मदद करना ।
वही इंसान हैं इंसान के जो काम आते हैं ।। 

अरुन शर्मा 'अनन्त'