हमराही

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Tuesday, June 18, 2013

'पिता' पर स्वरचित रचनाएँ : भाग 4.


मैं पिता हूँ तो क्या मुझमें दिल नही

मैं पिता हूँ तो क्या मुझमें दिल नही
क्यूँ मुझे कमतर समझा जाता है
क्या मुझमें वो जज़्बात नही
क्या मुझमें वो दर्द नही
जो बच्चे के कांटा चुभने पर
किसी माँ को होता है
क्या मेरा वो अंश नही
जिसके लिए मैं जीता हूँ
मुझे भी दर्द होता है
जब मेरा बच्चा रोता है
उसकी हर आह पर
मेरा भी सीना चाक होता है
मगर मैं दर्शाता नही
तो क्या मुझमें दिल नही
कोई तो पूछो मेरा दर्द
जब बेटी को विदा करता हूँ
जिसकी हर खुशी के लिए
पल पल जीता और मरता हूँ
उसकी विदाई पर
आंसुओं को आंखों में ही
जज्ब करता हूँ
माँ तो रोकर हल्का हो जाती है
मगर मेरे दर्द से बेखबर दुनिया
मुझको न जान पाती है
कितना अकेला होता हूँ तब
जब बिटिया की याद आती है
मेरा निस्वार्थ प्रेम
क्यूँ दुनिया समझ न पाती है
मेरे जज़्बात तो वो ही हैं
जो माँ के होते हैं
बेटा हो या बेटी
हैं तो मेरे ही जिगर के टुकड़े वो
फिर क्यूँ मेरे दिल के टुकडों को
ये बात समझ न आती है
मैं ज़िन्दगी भर
जिनके होठों की हँसी के लिए
अपनी हँसी को दफनाता हूँ
फिर क्यूँ उन्हें मैं
माँ सा नज़र ना आता हूँ

वंदना गुप्ता

बरगद से बाबूजी

आज भी
तपती धूप में जब
सिर पर बादल की छाँह
आ जाती है तो
उन बादलों के बीच मुझे
आपका ही आश्वस्त करता सा
मुस्कुराता चेहरा
क्यों दिखाई देता है बाबूजी ?
आज भी
दहकती रेत पर जब
मीलों चलने के बाद
घने बरगद का शीतल साया
मिल जाता है तो
उस बरगद की स्निग्ध शाखो
ं के स्पर्श में मुझे आपकी
उँगलियों का स्नेहिल स्पर्श
क्यों महसूस होता है बाबूजी ?
आज भी
संघर्षपूर्ण जीवन की
मुश्किल घड़ियों में हर कठिन
चुनौती का सामना करने के लिये
मुझे आपके हौसले और हिम्मत
देने वाले शब्दों की ज़रूरत
क्यों होती है बाबूजी ?
भले ही मैं जीवन के किसी भी
मुकाम पर पहुँच जाऊँ,
भले ही मैं अपने बच्चों का
संबल और सहारा बन जाऊँ
भले ही घर में सब हर बात पर
मार्गदर्शन के लिये
मुझ पर निर्भर हो जायें
लेकिन यह भी एक
ध्रुव सत्य है कि
आज भी
मेरे मन की यह
नन्हीं सी बच्ची
अपनी हर समस्या के
समाधान के लिये
आप पर ही आश्रित है बाबूजी
और हर मुश्किल घड़ी में
आज भी उसे
दीवार पर फ्रेम में जड़ी
आपकी तस्वीर से ही
सारी हिम्मत और प्रेरणा
मिलती है बाबूजी !

साधना वैद

पिता का साथ ही जैसे सुरक्षा का घेरा ....

पिता अपनी बेटियों को
बूढ़े
कहाँ नज़र आते है ...
उनको तो अपने पिता
वैसे ही दिखते है ,
जैसे बचपन में दिखते थे,
एक सच्चे हीरो जैसे ...!
जो उनके लिए
सब कुछ
कर सकते थे तब भी
और अभी भी ...
भीड़ हो या हो
अँधेरा हो ऊँगली पकड कर
या कभी गोद
में उठा कर निकाल ही ले
जाते थे तब ...
सर पर रखा
उनका स्नेहिल हाथ
जैसे सारी मुश्किलों से दूर
करता नज़र आता था तब ...
और अब भी
बेटियों को पिता का
साथ और ख्याल ही
अपने आप
में जैसे सुरक्षा का घेरा ही हो ...

उपासना सिआग