हमराही

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Saturday, June 22, 2013

मुखौटा

मुखौटे पर मुखौटा चढाए बैठे हैं सब
जाने असली चेहरा नजर आएगा कब


दुनिया हो गई है पाखंडी और चोर 
घर में कुछ और है बाहर कुछ और

घर में मुखौटा उतारकर दूसरा चढाते हैं 
अपने आप को गुणी और सभ्य बताते हैं


सोचते हैं पहचान छुपा लेंगे इसे पहन कर
खुद को खुद से ही अनजान बनाये बैठे हैं