हमराही

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Monday, January 27, 2014

अँधेरे रास हैं आए वफ़ा तुझसे निभाने में

1222    1222    1222     1222
बड़ी मुश्किल से कुछ 'अपने' मिले हमको ज़माने में 
कहीं उनको न खो दूँ ख्वाहिशें अपनी जुटाने में /

बने जो नाम के अपने हैं उनसे दूरियाँ अच्छी 
मिलेगा क्या भला नजदीकियां उनसे बढ़ाने में/

उजाले छोड़े हैं तेरे लिए रहना सदा रोशन  
अँधेरे रास हैं आए वफ़ा तुझसे निभाने में /

हसीं यादों ने छोड़े हैं सफ़र में ऐसे कुछ लम्हे 
रँगें हैं हाथ अपने अब निशाँ उनके मिटाने में /

दिलों को तोड़ते हैं जो विदा कर यार को ऐसे 
जो थामे धडकनें तेरी न डर अपना बनाने में /

हुई खामोश क्यों सरिता है तू आधार जीवन का 
गँवाना अब नहीं तुम वक्त खुद को आजमाने में 

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