हमराही

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Sunday, February 23, 2014

जो छत हो आसमां सारा यहाँ ऐसा मकाँ इक हो [गजल]

दिलों में रंजिशें ना हों यहाँ ऐसा जहाँ इक हो  
जो छत हो आसमां सारा यहाँ ऐसा मकाँ इक हो |

नया हर जो सवेरा हो मिले सुख शांति हर घर में
मिटे ना वक्त के हाथों जो ऐसा आशियाँ इक हो |

बुराई ,लोभ ,भ्रष्टाचार, धोखा दूर हो कोसों 
हो केवल प्यार हर घर में बसेरा अब वहाँ इक हो |

मिले केवल सुकूं अब और हो मुस्कान होठों पर 
घुली मिश्री हो बातों में यहाँ ऐसी जुबाँ इक हो |

निशानी अब हसीं यादों की लम्हा लम्हा मुस्काये 
हों चर्चे कुल जहां अपने ही ऐसी दास्ताँ इक हो | 

नहीं कुछ चाहिए मुझको दे दो विश्वास तुम इतना 
गवाही माँगे जग सारा वहाँ तेरा बयाँ इक हो |

नहीं हो मनमुटा रखना निशानी प्यार ही केवल 
मिटे ना वक्त के हाथों जो ऐसा अब निशाँ इक हो |

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