हमराही

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Saturday, June 28, 2014

मेरी मेट्रो


मेट्रो दुनिया है अजब 
रंग ढंग इसके गजब 

रेड ब्लू यलो ग्रीन वायलेट 
पाँच लाइन हैं दौड़े
दिल्ली का कोना कोना 
अब है इससे जोड़े 

मेट्रो में सब व्यस्त हैं 
क्या बूढ़ा क्या जवान 
कानों में टूटी लिए 
सुन रहे हैं गान 

कोई पढता किताब से 
कोई टैब है खोले
उलझे हैं सब उलझन में 
चेहरा भेद है खोले 

ऐसे हि बदनाम किया 
नारी चुप न होती 
महिलाओं के डिब्बे में 
मजे से हैं सब सोती 

भागदौड़ के जीवन में 
कौन किसे पहचाने 
लेकिन अपनी प्यारी मेट्रो 
सबको अपना जाने 

बैठ जमीं पर सफ़र करें 
अगर सीट न पायें
खड़े खड़े क्यों थकना है 
बैठ थकान मिटायें  

कोई जा रहा ड्यूटी पर 
कोई रहा है आ 
अपना अपना राग ही
हर कोई रहा है गा 

पहला डिब्बा महिलाओं का 
इसमें नर हैं वर्जित 
गलती से कोई चढ़ जाए 
तो फाइन हो जाए अर्जित 

मेट्रो के हैं क्या कहने 
भाईचारा रही बढ़ा 
नियमों से जो हैं अपरचित 
उन्हें नियम रही सिखा 

मेरी दिल्ली महान है 
इसमें मेरी जान 
रिकॉर्ड स्पीड के तोडती 
मेट्रो इसकी शान 
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