हमराही

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Monday, December 22, 2014

कागज़ कलम दवात [कुण्डलिनी]

बहते जब जज्बात हैं, रुकते ना तब हाथ 
कागज़ कलम दवात का, मिल जाता जो साथ ||
मिल जाता जो साथ, पीर है कागज़ हरता 
बहे कलम से पीर, ह्रदय सुकून से भरता ||
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