हमराही

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Tuesday, August 5, 2014

तक़दीर

कभी कभी
सोचती हूँ मैं
जब हाथ भरा है लकीरों से
तो कुछ तो मतलब होगा
हरेक के कोई मायने होंगे
कौन कौन सी लकीर किस किस तक़दीर के नाम
यह तो बताये कोई
मुझे समझाए कोई
सुना था
हाथों की चंद लकीरों का
यह खेल है बस तकदीरों का
अपने हाथ में लकीरें तो बहुत हैं
पर तक़दीर शायद रूठ गई है
आप ठीक कहते थे
बदल जाती हैं तकदीरें
अगर मेहनत से हाथ की लकीरें बदल दी जाएँ
इसीलिए करती हूँ कोशिश
चमकाने की उन लकीरों को
अपनी हिम्मत से ,
मेहनत से ,
जज्बे से
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जो मिलता है मुझे अपनों से