हमराही

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Friday, April 24, 2015

क्षणिकाएँ

जिंदगी के थपेड़ों ने
जब भी थका दिया मुझे
आ बैठी मैं
यादों के बरगद की छाँव में
सहलाया मुझे यादों ने
दे गईं
मन को असीम सुकून
आँखों से बहती पीर
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गिरगिट की तरह बदलती
मानवी संवेदनायें
कर जाती
मन को घायल
सुकून मिलता केवल
तेरी यादों की मरहम से
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