हमराही

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Sunday, August 9, 2015

मेरी तन्हाई

तुम आये थे 
दस्तक दी थी 
मेरे दिल के दरवाजे पर
कैद थी मैं 
खुद के बनाये उसूलों में 
जिम्मेदारियों की बंदिशों में 
खुल ना पाया मुझसे
ख्वाहिशों का किवाड़ 
सुना ना पाई तुझे 
अधूरी गुजारिशें 
गुजर गया 
वो ख्वाबों का कारवां 
आज फिर से 
खड़ी हूँ 
दोराहे पर 
इंतज़ार में
किसी दस्तक के 
मैं और मेरी तन्हाई .....