हमराही

सुस्वागतम ! अपना बहुमूल्य समय निकाल कर अपनी राय अवश्य रखें पक्ष में या विपक्ष में ,धन्यवाद !!!!

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Friday, April 24, 2015

क्षणिकाएँ

जिंदगी के थपेड़ों ने
जब भी थका दिया मुझे
आ बैठी मैं
यादों के बरगद की छाँव में
सहलाया मुझे यादों ने
दे गईं
मन को असीम सुकून
आँखों से बहती पीर
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गिरगिट की तरह बदलती
मानवी संवेदनायें
कर जाती
मन को घायल
सुकून मिलता केवल
तेरी यादों की मरहम से
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Friday, April 17, 2015

फिसल रही है जिंदगी

बढ़ रही हैं इच्छाएं 
अमर बेल की मानिंद 
पिघल रही हूँ मैं 
ग्लेशियर की मानिंद 
फिसल रही है जिंदगी 
रेत की मानिंद 
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Thursday, January 22, 2015

क्षणिका 1

1.
बढ़ रही हैं आशाएँ 
अनजानी 
पहचानी 
रूहानी 
ग्लोबल वार्मिंग की मानिंद 
सिमट रही हैं खुशियाँ 
तेरी 
मेरी 
अपनों की 
ग्लेशियर की मानिंद
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Friday, October 25, 2013

क्षणिकाएं

ख्वाबों में आकर फिर से,अरमान जगा गया कोई
कभी अपना था अब किसी का है,यह बता गया कोई/

संग बैठे थे कभी गाये थे मिलकर प्रीत के गीत
सब सुंदर जग सुहाना था ,जब तुम थे मेरे मीत/

कभी आँचल में तेरे गुज़ारे थे हमने दिन और रात
आज भी है खुश्बू का अहसास,तब मीठी थी हर बात/
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