हमराही

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Thursday, July 16, 2015

मिलन

मुद्दतों बाद
कल रात
बुलंदियों को छूती
खिलखिलाती
चहचहाती
एक शख्शियत से
मुलाकात हो गई
जो
खो गई थी कहीं
गुमनाम राहों में
जब
आइना बना जुबाँ
कर गया बयाँ
मेरी मुस्कराहटों की दास्ताँ
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खुद से खुद का मिलन खुशगवार था