हमराही

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Thursday, February 13, 2014

जादू की जफ्फी [कुण्डलिया]



मिलना यारों को सदा गले लगाकर यार 
जादू की जफ्फी मिले बढ़ता इससे प्यार /
बढ़ता इससे प्यार यार के दिल में बसते
दुख होते हैं दूर खोल के दिल जो हँसते  
आया है मधुमास फूल के जैसे खिलना  
मानें रूठे मीत प्यार से सबको मिलना //
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Wednesday, February 12, 2014

जागो [कुण्डलिया]

जागो प्यारे भोर में मन में ले विश्वास 
आस जगाती जिन्दगी करना है कुछ ख़ास /
करना है कुछ ख़ास मन में जगा लो चाहत 
करो वक्त पे काम मिले तनाव से राहत 
सरिता कहे पुकार नहीं मुश्किल से भागो 
पड़े बहुत हैं काम भोर हुई अभी जागो //
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वादा [कुण्डलिया]

वादा झूठा मत करो मत छेड़ो जज्बात 
झूठ कभी टिकता नहीं करना सच्ची बात /
करना सच्ची बात, झूठ के पैर न होते 
कोशिश करना सीख,हार के क्यों हो रोते 
साथ झूठ का छोड़ बना के नेक इरादा 
सरिता करे गुहार ,तोड़ कभी नहीं वादा //
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Saturday, February 8, 2014

मौत [कुण्डलिया]

डरना कैसा मौत से, यह तो सच्ची यार 
धोखा देती जिन्दगी , मौत निभाए प्यार /
मौत निभाए प्यार , साथ है लेकर जाती   
सबक जिंदगी रोज, नया हमको सिखलाती 
नेक मौत का काम, सबकी पीर को हरना 
सरिता कहे पुकार, मत तुम मौत से डरना //

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Friday, February 7, 2014

मन [ कुण्डलिया ]

मन के जीते जीत है ,मन के हारे हार 
मन को समझा ना अगर जीना हो दुश्वार/
जीना हो दुश्वार अगर मन दुख से भारी
सुख से पल संवार, कर के मन संग यारी
मन से कर लो प्रीत ,छोड़ो मोह अब तन के 
मन की ना हो हार ,प्यार के फेरो मनके//    
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Tuesday, February 4, 2014

मधुमास दोहावली


शुक्ल पंचमी माघ से ,शुरू शरद का अंत 
पवन बसंती है चली, आया नवल बसंत 

ले आया मधुमास है, चंचल मस्त फुहार
पीली चादर ओढ़ के, धरा करे शृंगार 

रात सुहानी हो गई, उजली है अब भोर 
डाली डाली फूल हैं ,हरियाली चहुँ ओर 

निर्मल अम्बर है हुआ, पाया धरा निखार 
जर्रे जर्रे में बसा , कुदरत में है प्यार 

रंग बिरंगी तितलियाँ , मन में भरें उमंग 
प्यार हिलोरें ले रहा , अब प्रीतम के संग 

पेड़ आम के बौर से, इतरायें हैं आज 
मन को है भाने लगी, कोयल की आवाज 

नव पल्लव का पालना, झुला रहे सब पेड़ 
खुशियाँ चारो ओर हैं, चिन्ता दिए खदेड़ 

गेहूँ की हैं बालियाँ, खिलती जौ के संग 
कुसुमाकर है आ गया, मन में बजे तरंग 

सरस्वती को पूज के, बढे बुद्धि औ' ज्ञान 
स्मरण शक्ति भी तीव्र हो पा विद्या वरदान 

शुक्ल माघ की पंचमी, भरे ह्रदय उल्लास 
संयम सच औ' शील से ,मिले स्नेह विश्वास 
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Saturday, February 1, 2014

पूस की वो रात


ठिठुरते हुए तारे 
शांत माहौल 
आँख मिचौली खेलता  
बादलों के पीछे छिपा चाँद 
जिसे निहारते हुए
एकाएक खुशबु लिए 
एक हवा का झोंका 
तुम्हारे स्पर्श सा
छू गया मुझे 
पूस की वो रात  

लेटते हुए 
कभी इस करवट 
कभी उस करवट 
ह्रदय में हुआ कंपन 
आँखों से छलका प्रेम 
भिगो गया
मेरा तन बदन   
मेरा मन  
तन्हा गुजारते हुए 
पूस की वो रात

तुम्हारी छूअन से  
पूस की वो रात 
आत्मीय हो उठती 
खिल उठती मैं 
खुल जाते 
सब ह्रदय के द्वार 
दिल 
चहकता 
बहकता 
मचलता 
पूस की वो रात 
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वो छूअन अब कभी नहीं होगी महसूस ....