हमराही

सुस्वागतम ! अपना बहुमूल्य समय निकाल कर अपनी राय अवश्य रखें पक्ष में या विपक्ष में ,धन्यवाद !!!!

Monday, February 24, 2014

डाली डाली [कुण्डलिया]

डाली डाली फूल हैं ,हरियाली चहुँ ओर   
रात सुहानी हो गई उजली है अब भोर /
उजली है अब भोर नभ निर्मल है भाया 
देख धरा शृंगार मनुज ह्रदय मुस्कराया 
खिले देखकर पुष्प ,ख़ुशी से झूमे माली 
करते हैं मधुपान ,भंवरे डाली डाली //
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Sunday, February 23, 2014

जो छत हो आसमां सारा यहाँ ऐसा मकाँ इक हो [गजल]

दिलों में रंजिशें ना हों यहाँ ऐसा जहाँ इक हो  
जो छत हो आसमां सारा यहाँ ऐसा मकाँ इक हो |

नया हर जो सवेरा हो मिले सुख शांति हर घर में
मिटे ना वक्त के हाथों जो ऐसा आशियाँ इक हो |

बुराई ,लोभ ,भ्रष्टाचार, धोखा दूर हो कोसों 
हो केवल प्यार हर घर में बसेरा अब वहाँ इक हो |

मिले केवल सुकूं अब और हो मुस्कान होठों पर 
घुली मिश्री हो बातों में यहाँ ऐसी जुबाँ इक हो |

निशानी अब हसीं यादों की लम्हा लम्हा मुस्काये 
हों चर्चे कुल जहां अपने ही ऐसी दास्ताँ इक हो | 

नहीं कुछ चाहिए मुझको दे दो विश्वास तुम इतना 
गवाही माँगे जग सारा वहाँ तेरा बयाँ इक हो |

नहीं हो मनमुटा रखना निशानी प्यार ही केवल 
मिटे ना वक्त के हाथों जो ऐसा अब निशाँ इक हो |

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Tuesday, February 18, 2014

थोड़ा हँस लो थोड़ा गा लो [गीत]


आओ कुछ तो समय निकालो
थोड़ा हंस लो थोड़ा गा लो 

जीवन की आपाधापी में 
अपने पीछे छूट न जाएँ 
नन्हे सपने टूट न जाएँ 
जरा नया उत्साह जगा लो 
थोड़ा हंस लो..........

अपने हम से रूठ गए जो 
जीवन पथ पर छूट गए जो 
उनकी यादों से अब निकलो 
रूठ गए जो उन्हें मना लो 
थोड़ा हंस लो..........

देख समय ने करवट खाई
फिर क्यों है मायूसी छाई
दे दो गम को आज विदाई 
बुरे समय को हँस कर टालो 
थोड़ा हंस लो..........

दिल सच्चा हो ना हो झूठा 
कोई ना हो हमसे रूठा 
रिश्ता उपजे एक अनूठा 
दिल से अपनों को अपना लो 
थोड़ा हंस लो..........

बात करेंगे बात बनेगी
सारी दुनिया तुम्हें सुनेगी
नैया इक दिन पार लगेगी 
खुशियाँ बांटो खुशियाँ पा लो
थोड़ा हंस लो.......... 

अब समय ने ली अंगड़ाई 
क्यों है अब भी चुप्पी छाई
सबने किस्मत स्वयं बनाई    
अपनी किस्मत स्वयं बनालो 
थोड़ा हंस लो..........

जब कारवाँ छूट जाएगा  
स्वयं को अकेला पाएगा 
प्रभु नाम ही संग जाएगा
अपनी यात्रा सफल बनालो
थोड़ा हंस लो..........

Monday, February 17, 2014

दिल्ली मेट्रो [कुण्डलिया]

दिल्ली मेरी जान है, मेट्रो इसकी शान 
मेट्रो दुनिया है अजब, इसकी इक पहचान/ 
इसकी इक पहचान ,रिकॉर्ड स्पीड के तोड़े 
रेड ब्लू यलो ग्रीन औ' वायलट हैं दौड़े
गए जाम से छूट ,क्यों उड़ायें अब खिल्ली?
कर रही है विकास,हमारी प्यारी दिल्ली //
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कुण्डलियाँ ओ बी ओ छन्दोत्सव में


"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक-35

पीटी करते हैं सभी नीली है पोशाक 
सारे बच्चे हैं खड़े एक रहा है ताक 
एक रहा है ताक पार है उसको जाना  
खेलें हैं जो खेल देख के उसको आना
शिक्षक हैं दो बीच एक बजा रहा सीटी 
दूजा देता सीख, करेंगे कैसे पीटी // 


भैया दीदी हैं खड़े नीला है गणवेश 
कुछ तो पहले से खड़े कुछ ने किया प्रवेश 
कुछ ने किया प्रवेश लगा है आना जाना 
इक नन्हा है बाल यहाँ है उसको आना 
शिक्षक देते सीख पार हो कैसे नैया
लेकर कलम दवात, मैं भी चलूँगा भैया // 

कसरत करते हैं सभी बूझें कई सवाल 
हसरत सीने में लिए एक खड़ा है बाल 
एक खड़ा है बाल दूर फैलाये बाहें 
लगता उसको खेल कठिन हैं लेकिन राहें 
बच्चे आयें स्कूल, ह्रदय में पाले हसरत  
बाल रहा है सोच खेल यह कैसा कसरत //
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Sunday, February 16, 2014

मधुमास [कुण्डलिया]

छाया है मधुमास में कुदरत में भी प्यार 
पुष्प खिले हर डाल हैं खुश है आज बयार 
खुश है आज बयार वाटिका खिलके महकी 
कोयल गाये गीत चाल भौंरे की बहकी /
सरसों पीली देख किसान ह्रदय हर्षाया 
प्रेमदिवस है आज रंग बासंती छाया // 
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Friday, February 14, 2014

बासंती हाइकु

आया बसंत
निर्मल है आकाश 
दिल बसंत  


नभ विशाल 
सतरंगी पतंगें 
मन निहाल 


खिले हैं फूल 
रंगीन तितलियाँ 
प्रेम कुबूल 

धरा शृंगार 
कुसुमाकर आया 
पीले हैं हार 



नीला गगन 
रंगीला है चमन 
मन चंचल 

मन पतंगा 
इन्द्रधनुषी फूल 
बासंती प्यार 


मन के सच्चे 
रंगीन तितलियाँ 
प्रसन्न बच्चे 
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